सोम प्रदोष व्रत कथा एक गरीब ब्राह्मणी और उसके पुत्र के जीवन में आई अद्भुत परिवर्तन की कहानी है, जो उसके अटूट विश्वास और प्रदोष व्रत के प्रभाव से संबंधित है। इस कथा में, ब्राह्मणी की दयालुता और उसके व्रत के प्रभाव से विदर्भ के राजकुमार और उसके राज्य को उसके दुर्भाग्य से मुक्ति मिलती है। अंशुमति, एक गंधर्व कन्या के साथ उसके विवाह और राज्य की पुनः प्राप्ति की कहानी यह दर्शाती है कि किस प्रकार ईश्वरीय आशीर्वाद और श्रद्धा से कठिनाइयों का सामना कर सफलता प्राप्त की जा सकती है।
इस कथा का महत्व यह है कि यह विश्वास, धैर्य, और ईश्वर में अटूट आस्था की शक्ति को प्रकट करता है। यह बताता है कि कैसे व्रत और पूजा के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करके मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं का समाधान पा सकता है। सोम प्रदोष व्रत कथा भक्तों को यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और ईश्वर की पूजा से जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता की प्राप्ति संभव है। यह कथा हमें यह भी बताती है कि किसी की सहायता करना और दयालु बनना कैसे अप्रत्याशित और अद्भुत परिणाम ला सकता है।
व्रत कथा
जो प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है वह प्रदोष सोम प्रदोष व्रत कहलाता है। सोमवार को भगवान शिव का दिन माना जाता है अतः इस दिन प्रदोष व्रत होने से उसकी महत्ता और भी अधिक बढ जाती है।
एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई आश्रयदाता नहीं था, इसलिए प्रातः होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। भिक्षाटन से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी।
एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आई। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बन्दी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था, इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था।
राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा। एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार भा गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। उन्होंने वैसा ही किया।
ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उसके व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर आनन्दपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के माहात्म्य से जैसे राजकुमार और ब्राह्मण-पुत्र के दिन फिरे, वैसे ही शंकर भगवान अपने अन्य सभी भक्तों के दिन भी फेरते हैं।
हर हर महादेव !




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