थैलेसीमिया एक ऐसी आनुवंशिक रक्त संबंधी बीमारी (genetic blood disorder) है, जिसमें शरीर में हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) का निर्माण सामान्य रूप से नहीं हो पाता। हीमोग्लोबिन हमारे रक्त के लाल कोशिकाओं (Red Blood Cells) का मुख्य प्रोटीन होता है, जो फेफड़ों से ऑक्सीजन को शरीर के अन्य हिस्सों तक पहुँचाने का काम करता है। जब हीमोग्लोबिन सही मात्रा में नहीं बनता, तो शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है और व्यक्ति को एनीमिया (Anemia) जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है।
थैलेसीमिया कोई संक्रमण या वायरस से होने वाली बीमारी नहीं है — बल्कि यह माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से ट्रांसफर होती है। यानी, अगर माता या पिता में से कोई एक थैलेसीमिया का कैरियर (Carrier) है, तो बच्चे में इसके होने की संभावना बढ़ जाती है। यही कारण है कि इसे “वंशानुगत रक्त विकार (Hereditary Blood Disorder)” कहा जाता है।
यह बीमारी दुनिया भर में पाई जाती है, लेकिन भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य पूर्व और भूमध्यसागरीय देशों में इसके मरीजों की संख्या अधिक है। भारत में हर साल हजारों बच्चे थैलेसीमिया के साथ जन्म लेते हैं, जिनमें से कई को जीवनभर नियमित रक्त चढ़ाने (Blood Transfusion) की आवश्यकता होती है।
थैलेसीमिया को सही समय पर पहचानना और उचित इलाज शुरू करना बहुत जरूरी है, क्योंकि यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर के कई अंगों को प्रभावित कर सकती है — जैसे कि हृदय, जिगर (Liver) और हड्डियाँ। हालाँकि, आज आधुनिक चिकित्सा पद्धति और Bone Marrow Transplant जैसी तकनीकों के जरिए इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, थैलेसीमिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक जागरूकता का विषय है — क्योंकि थोड़ी सी जानकारी और समय पर जांच से इसे आने वाली पीढ़ियों में रोका जा सकता है।
थैलेसीमिया क्या होता है?
थैलेसीमिया (Thalassemia) एक आनुवंशिक रक्त विकार (Genetic Blood Disorder) है, जिसमें शरीर में हीमोग्लोबिन (Hemoglobin) का निर्माण असामान्य रूप से होता है। हीमोग्लोबिन हमारे लाल रक्त कोशिकाओं (Red Blood Cells) का सबसे महत्वपूर्ण घटक है, जो ऑक्सीजन को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाता है। जब हीमोग्लोबिन पर्याप्त मात्रा में नहीं बनता या उसकी संरचना दोषपूर्ण होती है, तो शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति घट जाती है — यही स्थिति थैलेसीमिया कहलाती है।
थैलेसीमिया में शरीर या तो पर्याप्त मात्रा में रेड ब्लड सेल्स (RBCs) नहीं बना पाता, या जो बनते हैं वे सामान्य रूप से कार्य नहीं करते। इसके कारण मरीज को लगातार थकान, कमज़ोरी, और त्वचा का पीला पड़ना (Pallor) जैसी समस्याएं होती हैं। यह धीरे-धीरे एनीमिया (Anemia) में बदल जाती है, जो गंभीर रूप ले सकती है।
इस बीमारी की सबसे खास बात यह है कि यह वंशानुगत (Hereditary) है — यानी यह माता-पिता से बच्चों में जीन के माध्यम से आती है। अगर किसी व्यक्ति के माता या पिता में से एक थैलेसीमिया कैरियर (Carrier) है, तो बच्चे में हल्के लक्षण हो सकते हैं। लेकिन यदि दोनों माता-पिता कैरियर हैं, तो बच्चे में गंभीर थैलेसीमिया (Thalassemia Major) होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
थैलेसीमिया का कोई बाहरी संक्रमण या खानपान से सीधा संबंध नहीं होता। यह जन्म से पहले ही तय हो जाता है कि व्यक्ति इस बीमारी से प्रभावित होगा या नहीं। इसलिए, शादी से पहले या गर्भधारण से पहले थैलेसीमिया कैरियर टेस्ट करवाना बहुत आवश्यक माना जाता है।
संक्षेप में कहा जाए तो —
थैलेसीमिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर स्वस्थ रक्त कोशिकाएँ नहीं बना पाता, और परिणामस्वरूप व्यक्ति को जीवनभर खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
थैलेसीमिया के प्रकार
थैलेसीमिया को मुख्य रूप से हीमोग्लोबिन की चेन (chain) में होने वाले दोष के आधार पर दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जाता है — अल्फा थैलेसीमिया (Alpha Thalassemia) और बीटा थैलेसीमिया (Beta Thalassemia)। दोनों ही प्रकार शरीर में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, लेकिन इनकी गंभीरता और प्रभाव अलग-अलग होते हैं।
1. अल्फा थैलेसीमिया (Alpha Thalassemia)
हीमोग्लोबिन दो प्रकार की प्रोटीन चेन से मिलकर बनता है – अल्फा (α) और बीटा (β)।
अल्फा थैलेसीमिया में अल्फा ग्लोबिन जीन में गड़बड़ी होती है।
इस जीन की चार कॉपीज़ होती हैं (दो माँ से और दो पिता से), और इनमें कितनी कॉपी प्रभावित है, उसी पर बीमारी की गंभीरता निर्भर करती है।
अल्फा थैलेसीमिया के उप-प्रकार:
- Silent Carrier: केवल एक जीन प्रभावित होता है, कोई लक्षण नहीं दिखते।
- Alpha Thalassemia Trait (Minor): दो जीन प्रभावित होते हैं, हल्का एनीमिया हो सकता है।
- Hemoglobin H Disease: तीन जीन प्रभावित होते हैं, जिससे मध्यम से गंभीर एनीमिया होता है।
- Hydrops Fetalis (Major): चारों जीन प्रभावित होते हैं – यह स्थिति बेहद गंभीर होती है और अधिकांश मामलों में शिशु जन्म से पहले ही जीवित नहीं रह पाता।
2. बीटा थैलेसीमिया (Beta Thalassemia)
इस प्रकार में बीटा ग्लोबिन जीन में दोष पाया जाता है।
हर व्यक्ति के पास बीटा जीन की दो कॉपी होती हैं – एक माँ से और एक पिता से।
बीटा थैलेसीमिया को भी तीन स्तरों में बाँटा गया है:
- Beta Thalassemia Minor (Trait):
एक जीन प्रभावित होता है। ऐसे व्यक्ति में आमतौर पर कोई गंभीर लक्षण नहीं दिखते, लेकिन वे कैरियर होते हैं और जीन आगे बच्चों में ट्रांसफर हो सकता है। - Beta Thalassemia Intermedia:
दोनों जीन प्रभावित होते हैं, लेकिन आंशिक रूप से। मरीज को कभी-कभी खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। - Beta Thalassemia Major:
दोनों बीटा जीन पूरी तरह से प्रभावित होते हैं। यह सबसे गंभीर रूप है जिसमें बच्चे को जन्म के कुछ महीनों बाद से ही नियमित रक्त चढ़ाना (Blood Transfusion) पड़ता है।
संक्षेप में:
अल्फा और बीटा थैलेसीमिया दोनों ही हीमोग्लोबिन की उत्पादन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं,
लेकिन बीटा थैलेसीमिया भारत और दक्षिण एशिया में सबसे आम पाया जाने वाला प्रकार है।
थैलेसीमिया के कारण
थैलेसीमिया एक आनुवंशिक (Genetic) या वंशानुगत रक्त विकार है, यानी यह किसी संक्रमण, खानपान या जीवनशैली से नहीं होता।
इस बीमारी का मूल कारण है — हीमोग्लोबिन बनाने वाले जीन (Genes) में होने वाला म्यूटेशन (Mutation) या बदलाव।
1. जीन में परिवर्तन (Gene Mutation)
हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन दो मुख्य प्रोटीन चेन से बनता है – अल्फा (α) और बीटा (β)।
थैलेसीमिया तब होता है जब इन चेन को नियंत्रित करने वाले जीन में गड़बड़ी आ जाती है।
- अगर अल्फा जीन प्रभावित हो, तो अल्फा थैलेसीमिया विकसित होता है।
- अगर बीटा जीन प्रभावित हो, तो बीटा थैलेसीमिया विकसित होता है।
यह जीन संबंधी दोष शरीर में सही मात्रा और गुणवत्ता वाला हीमोग्लोबिन बनने नहीं देता, जिसके परिणामस्वरूप शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है।
👨👩👧👦 2. माता-पिता से जीन का ट्रांसफर
थैलेसीमिया एक वंशानुगत (Hereditary) बीमारी है — यानी यह माता-पिता से बच्चों में उनके जीन के माध्यम से ट्रांसफर होती है।
- अगर किसी व्यक्ति के माता या पिता में से एक थैलेसीमिया कैरियर (Carrier) है, तो बच्चे में हल्के लक्षण (Thalassemia Minor) हो सकते हैं।
- लेकिन अगर दोनों माता-पिता कैरियर हैं, तो बच्चे में Thalassemia Major (गंभीर रूप) होने की संभावना 25% तक होती है।
- वहीं 50% संभावना रहती है कि बच्चा कैरियर बने, और 25% संभावना कि वह पूरी तरह स्वस्थ हो।
इसलिए, यह बीमारी हर पीढ़ी में बिना बाहरी कारण के भी दोबारा दिखाई दे सकती है।
⚠️ 3. शादी से पहले जांच न करवाना
भारत और एशिया के कई हिस्सों में लोग अब भी शादी से पहले थैलेसीमिया कैरियर टेस्ट नहीं करवाते।
अगर दो कैरियर व्यक्ति शादी करते हैं, तो बच्चों में इस बीमारी के गंभीर रूप से प्रभावित होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
4. कोई बाहरी कारण नहीं
थैलेसीमिया का कारण न तो संक्रमण, वायरस, खानपान या पर्यावरण होता है।
यह पूरी तरह से जन्मजात (Congenital) स्थिति है, जो गर्भ में रहते हुए ही तय हो जाती है।
संक्षेप में:
थैलेसीमिया का मूल कारण है जीन में गड़बड़ी, और इसे रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है —
शादी से पहले या गर्भधारण से पहले कैरियर टेस्ट करवाना।
थैलेसीमिया के लक्षण (Symptoms)
थैलेसीमिया के लक्षण व्यक्ति से व्यक्ति में अलग हो सकते हैं — यह इस बात पर निर्भर करता है कि बीमारी का प्रकार (Minor, Intermedia या Major) कौन-सा है।
शुरुआती चरण में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं, लेकिन गंभीर रूप में यह पूरे शरीर की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है।
🔹 1. थैलेसीमिया माइनर (Thalassemia Minor) के लक्षण
यह हल्का रूप होता है, जिसमें अक्सर कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देता।
कई लोग तो यह भी नहीं जानते कि वे कैरियर हैं।
कभी-कभी निम्नलिखित संकेत देखे जा सकते हैं:
- हल्का एनीमिया (खून की कमी)
- जल्दी थकान या कमजोरी महसूस होना
- त्वचा का पीला या फीका पड़ना
🔹 2. थैलेसीमिया इंटरमीडिया (Thalassemia Intermedia) के लक्षण
इस रूप में लक्षण थोड़ा स्पष्ट और लगातार रहते हैं, जैसे:
- मध्यम स्तर का एनीमिया
- सांस लेने में तकलीफ
- चक्कर या सिरदर्द
- बच्चों में विकास (Growth) धीमा होना
- हड्डियों का असामान्य आकार (विशेषकर चेहरे और खोपड़ी में)
🔹 3. थैलेसीमिया मेजर (Thalassemia Major) के लक्षण
यह थैलेसीमिया का सबसे गंभीर रूप है, जिसके लक्षण जन्म के कुछ महीनों बाद ही दिखाई देने लगते हैं।
इस अवस्था में शरीर अपने आप पर्याप्त मात्रा में लाल रक्त कोशिकाएँ नहीं बना पाता।
मुख्य लक्षण हैं:
- गंभीर एनीमिया (खून की भारी कमी)
- त्वचा का बहुत ज्यादा पीला पड़ना या पीलिया (Jaundice)
- बार-बार थकावट और कमजोरी
- पेट में सूजन (लिवर और प्लीहा का बढ़ना)
- चेहरे की हड्डियों का उभरना (Facial Bone Deformity)
- दिल की धड़कन तेज़ होना (Palpitations)
- बच्चों में विकास रुक जाना या देरी से होना
अगर मरीज को समय पर इलाज न मिले तो यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती है।
थैलेसीमिया मेजर वाले बच्चों को हर कुछ हफ्तों में ब्लड ट्रांसफ्यूज़न की आवश्यकता होती है ताकि शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य रहे।
⚠️ कब डॉक्टर से संपर्क करें
अगर किसी बच्चे या व्यक्ति में बार-बार एनीमिया, पीली त्वचा, या असामान्य थकावट महसूस हो रही है,
तो तुरंत रक्त जांच (CBC और Hemoglobin Electrophoresis) करवाना चाहिए।
संक्षेप में:
थैलेसीमिया के लक्षण धीरे-धीरे बढ़ते हैं, लेकिन अगर समय रहते पहचान ली जाए,
तो इलाज और प्रबंधन से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है।
थैलेसीमिया का इलाज (Treatment)
थैलेसीमिया का इलाज उसके प्रकार और गंभीरता पर निर्भर करता है।
थैलेसीमिया माइनर (Minor) वाले लोगों को आमतौर पर किसी खास इलाज की आवश्यकता नहीं होती,
लेकिन थैलेसीमिया इंटरमीडिएट (Intermedia) और थैलेसीमिया मेजर (Major) के मरीजों को जीवनभर नियमित चिकित्सा देखभाल की जरूरत होती है।
आधुनिक चिकित्सा पद्धति के जरिए आज थैलेसीमिया को नियंत्रित करना संभव है,
हालाँकि इसका स्थायी इलाज (Permanent Cure) अभी भी सीमित मामलों में ही संभव है।
🔹 1. नियमित रक्त चढ़ाना (Regular Blood Transfusion)
थैलेसीमिया मेजर वाले मरीजों के लिए यह सबसे जरूरी और आम इलाज है।
क्योंकि उनका शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता,
इसलिए उन्हें हर 2–4 सप्ताह में ब्लड ट्रांसफ्यूजन की आवश्यकता होती है।
इससे शरीर में ऑक्सीजन का स्तर सामान्य रहता है और बच्चे का विकास ठीक से हो पाता है।
हालाँकि, लगातार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन (Iron) की अधिकता हो सकती है,
जिसे नियंत्रित करना जरूरी होता है।
🔹 2. आयरन चिलेशन थेरेपी (Iron Chelation Therapy)
बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन से शरीर में अतिरिक्त आयरन जमा हो जाता है,
जो हृदय (Heart), जिगर (Liver) और अंतःस्रावी ग्रंथियों (Endocrine glands) को नुकसान पहुँचा सकता है।
इसे निकालने के लिए मरीज को Iron Chelation Therapy दी जाती है,
जिसमें दवाइयाँ जैसे Deferoxamine, Deferiprone या Deferasirox उपयोग की जाती हैं।
ये दवाएँ शरीर से अतिरिक्त आयरन को मूत्र या मल के जरिए बाहर निकालने में मदद करती हैं।
🔹 3. बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant – BMT)
यह थैलेसीमिया के लिए एकमात्र संभावित स्थायी इलाज माना जाता है।
इस प्रक्रिया में मरीज के दोषपूर्ण बोन मैरो को हटा कर,
किसी स्वस्थ डोनर (Donor) का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है।
अगर मरीज का डोनर जेनेटिकली मैच करता है (जैसे भाई या बहन),
तो सफलता की संभावना काफी बढ़ जाती है।
हालाँकि, यह प्रक्रिया महंगी और जटिल होती है,
इसलिए हर मरीज के लिए यह संभव नहीं होती।
🔹 4. नई थैरेपी और आधुनिक शोध
आजकल डॉक्टर और वैज्ञानिक Gene Therapy और Stem Cell Therapy जैसी नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं,
जिनसे भविष्य में थैलेसीमिया का स्थायी इलाज संभव हो सकता है।
इसके अलावा, CRISPR Gene Editing जैसी तकनीक से जीन में मौजूद दोष को सीधे ठीक करने के प्रयास भी जारी हैं।
🔹 5. सहायक इलाज (Supportive Care)
- Folic Acid Supplements – लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है।
- Balanced Diet – आयरन कम मात्रा में रखने वाला भोजन (जैसे दूध, सब्जियाँ, फल)।
- संक्रमण से बचाव – ब्लड ट्रांसफ्यूजन करवाने वाले मरीजों को Hepatitis B और C जैसी बीमारियों से सुरक्षा के लिए वैक्सीन दी जाती है।
- नियमित हेल्थ चेकअप – हृदय, लिवर और हार्मोन स्तर की निगरानी जरूरी है।
संक्षेप में:
थैलेसीमिया का इलाज लंबी प्रक्रिया है, लेकिन सही प्रबंधन, नियमित ट्रांसफ्यूजन और आधुनिक थैरेपी से
मरीज सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
थैलेसीमिया एक गंभीर आनुवंशिक रक्त विकार (Genetic Blood Disorder) है,
जो एक व्यक्ति के जीवन के साथ-साथ पूरे परिवार को प्रभावित कर सकता है।
हालाँकि यह बीमारी जन्म से पहले ही तय हो जाती है, लेकिन इसकी समय पर पहचान और सही प्रबंधन से
मरीज एक लंबा और सामान्य जीवन जी सकता है।
आज चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति के कारण थैलेसीमिया अब “लाइलाज” नहीं रहा।
नियमित ब्लड ट्रांसफ्यूजन, आयरन चिलेशन थैरेपी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट जैसी आधुनिक तकनीकें
मरीजों के जीवन को बेहतर बना रही हैं।
लेकिन इस बीमारी से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है — जागरूकता और रोकथाम।
अगर हर व्यक्ति शादी से पहले थैलेसीमिया कैरियर टेस्ट कराए,
तो आने वाली पीढ़ियों को इस बीमारी से बचाया जा सकता है।
समाज में थैलेसीमिया को लेकर जागरूकता फैलाना, रक्तदान (Blood Donation) को प्रोत्साहित करना
और मरीजों को मानसिक व सामाजिक सहयोग देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।




